आईआईटी रुड़की की पहल से पहाड़ों में बदलाव, एकीकृत खेती बनी आत्मनिर्भरता की रीढ़
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सतत ग्रामीण विकास की एक सशक्त और प्रेरक तस्वीर अल्मोड़ा जनपद के खुंट गांव से सामने आई है, जहां आईआईटी रुड़की के नेतृत्व में संचालित रूटैज स्मार्ट विलेज सेंटर यानी आरएसवीसी पहल के जरिए एकीकृत खेती, महिला सशक्तिकरण और सामुदायिक नवाचार को नई दिशा मिल रही है। यह पहल भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय की परिकल्पना पर आधारित है, जिसे आईआईटी रुड़की द्वारा जमीनी स्तर पर सफलतापूर्वक क्रियान्वित किया जा रहा है। आईआईटी रुड़की के मार्गदर्शन में सेतु आयोग, नेहिर हिमालयन फाउंडेशन, आरटी फाउंडेशन, रेशम विभाग और स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि योजनाएं केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि गांव के रोज़मर्रा के जीवन में वास्तविक बदलाव के रूप में दिखाई दें। आरएसवीसी के अंतर्गत एकीकृत खेती की दिशा में अब तक एक लाख से अधिक शहतूत पौधों का रोपण किया जा चुका है, जिसकी अगुवाई मुख्य रूप से गांव की महिलाओं ने की है। शहतूत की खेती से रेशम उत्पादन और मूल्यवर्धित उत्पादों के माध्यम से नई आजीविका के अवसर तैयार हो रहे हैं। इसके साथ ही किसान शहतूत के साथ हल्दी और अदरक की मिश्रित खेती कर रहे हैं और शहतूत चाय जैसे नए उत्पादों पर भी काम किया जा रहा है। यह मॉडल न केवल आय बढ़ा रहा है, बल्कि मृदा संरक्षण और भूमि स्थिरता में भी सहायक सिद्ध हो रहा है। आईआईटी रुड़की द्वारा तकनीकी नवाचार के तहत आरएसवीसी में उन्नत बागेश्वरी ऊन चरखा स्थापित किया गया है, जिसे स्थानीय कारीगरों की जरूरतों के अनुसार पुनः डिज़ाइन किया गया है। यह चरखा पैरों और बिजली—दोनों से संचालित किया जा सकता है तथा इसमें बैटरी बैकअप, सोलर सपोर्ट और समायोज्य गति जैसी सुविधाएं मौजूद हैं। इससे महिलाएं और हथकरघा कर्मी कम श्रम में बेहतर गुणवत्ता का सूत तैयार कर पा रहे हैं, जिससे पारंपरिक आजीविका को नई मजबूती मिली है। इस पहल का सबसे बड़ा प्रभाव महिला सशक्तिकरण के रूप में देखने को मिल रहा है। जो महिलाएं पहले घरेलू दायरे तक सीमित थीं, वे अब रोपण, योजना निर्माण और आजीविका गतिविधियों में नेतृत्वकारी भूमिका निभा रही हैं। बच्चियों से लेकर बुज़ुर्ग महिलाओं तक की सक्रिय भागीदारी ने इस अभियान को एक समावेशी सामुदायिक आंदोलन बना दिया है। आईआईटी रुड़की द्वारा 17 जनवरी 2026 को खुंट गांव में ‘हरित खुलगाड़ नारी शक्ति उत्सव 2026’ का आयोजन किया गया, जिसमें ग्रामीणों की उपलब्धियों को सम्मानित किया गया और भविष्य की विकास योजनाओं पर मंथन हुआ। वहीं आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के. के. पंत ने कहा कि जब वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीक को जमीनी स्तर पर उतारा जाता है, तो गांव आत्मनिर्भर बनते हैं और पलायन रुकता है। वहीं सेतु आयोग के उपाध्यक्ष राज शेखर जोशी ने खुंट मॉडल को उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एक प्रभावी और विस्तार योग्य मॉडल बताया। एकीकृत खेती, तकनीकी नवाचार और सामुदायिक भागीदारी के जरिए आईआईटी रुड़की की यह पहल विजन 2047 की उस सोच को साकार कर रही है, जिसमें गांव केवल योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास के सक्रिय भागीदार बनते हैं।



























