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आस्था की आड़ में अंधविश्वास का नंगा नाच.! साबिर पाक की दरगाह में कथित ‘हाज़िरी’ के नाम पर पाकीज़गी हो रही तार-तार, जिम्मेदारी खामोश…

(मौहम्मद नाज़िम) पिरान कलियर। दुनियाभर में अमन, मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम देने वाली हज़रत साबिर पाक (रह.) की दरगाह आज एक गंभीर सवाल के घेरे में है। वह मुक़द्दस चौखट, जहां कभी रूह को सुकून मिलता था, आज कथित “हाज़िरी” के नाम पर अंधविश्वास, अभद्रता और अराजकता का अड्डा बनती जा रही है। अफ़सोस यह है कि दरगाह की पाकीज़गी की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी जिन कंधों पर है, वही सब कुछ देखकर भी खामोश नज़र आ रहे हैं।

“रूहानियत नहीं, अफ़रातफ़री का आलम”

उर्स-ए-साबिरी हो या नौचंदी जुमेरात—हर मौके पर लाखों ज़ायरीन साबिर पाक की ज़ियारत के लिए पिरान कलियर पहुंचते हैं। ज़ायरीन की इसी भीड़ के सहारे हर साल करोड़ों रुपये के ठेके नीलाम होते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या इंतज़ामिया की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ आर्थिक इंतज़ाम तक सीमित है? दरगाह के भीतर पनप रही
अव्यवस्था और अवांछित गतिविधियों पर निगरानी आखिर क्यों नहीं?

“महफ़िलखाने के सामने ‘जिन-भूत’ का कथित खेल”

दरगाह परिसर और उसके आसपास सुबह से लेकर इशा की नमाज़ तक कुछ महिलाएं और युवतियां कथित जिन, भूत-प्रेत और बीमारी के नाम पर अजीबोगरीब हरकतें करती दिखाई देती हैं। कभी उछल-कूद, कभी चीख-पुकार, तो कभी अश्लील गालियां—यह सब खुलेआम होता है। कई मामलों में ब्लेड से हाथ काटकर खून निकालने जैसी खौफनाक हरकतें भी सामने आई हैं। ज़ायरीन पर हमला, चूड़ियां तोड़ना और मारपीट अब आम बात बनती जा रही है।

“भगदड़ और दहशत से सहमे ज़ायरीन”

अचानक दौड़ती युवतियां, उनके पीछे भागते पुरुष और पलभर में मचती भगदड़—यह मंजर ज़ायरीन को डराने के लिए काफी है। कई महिला ज़ायरीन तो इस माहौल से घबराकर दरगाह से बाहर निकल जाती हैं और दोबारा अंदर जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा पातीं।

“पीआरडी जवान और कर्मचारी—खामोश दर्शक”

दरगाह की मर्यादा बनाए रखने के लिए तैनात पीआरडी जवान और कर्मचारी इन सब घटनाओं को देखते हुए भी मूक दर्शक बने रहते हैं। हैरत की बात यह है कि इस अंधविश्वास को “हाज़िरी” का नाम दे दिया गया है। मस्जिद से रोज़ इशा के बाद एलान होता है—“हाज़िरी वाले बाहर चले जाएं”, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त में यह सिर्फ़ एक औपचारिकता बनकर रह गया है।

“हाज़िरी या गुस्ताख़ी?

जिन लोगों को ज़ायरीन को दरगाह के आदाब और उसूल समझाने चाहिए, वही हाज़िरी की असल रूह से अनजान दिखते हैं। उछल-कूद, गालियां और बदतमीज़ी को हाज़िरी बताकर साबिर पाक की शान में खुली गुस्ताख़ी की जा रही है, और इंतज़ामिया आंखें मूंदे बैठी है।

“पुरानी घटनाएं, नए खतरे”

यह बदइंतजामी पहले भी खतरनाक नतीजे दे चुकी है। कभी जालियों पर हथौड़े से हमला, तो कभी महफ़िलखाने में महिला द्वारा बच्चे को जन्म देने जैसी घटनाएं—बवाल हुआ, सुरक्षा बढ़ी, लेकिन हालात में स्थायी सुधार नहीं हुआ।

“सोशल मीडिया पर शर्मनाक तस्वीरें”

अब हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि महिलाएं दरगाह की जालियों पर चढ़ती नजर आती हैं और लोग इन दृश्यों की रील बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं। नतीजतन, साबिर पाक की दरगाह की पहचान रूहानियत नहीं, बल्कि अराजकता और भय के रूप में दुनिया तक पहुंच रही है।

“सवाल अब भी कायम
क्या यह आस्था है या अंधविश्वास का संगठित खेल?

क्या दरगाह इंतज़ामिया की भूमिका सिर्फ़ ठेके नीलाम करने तक सीमित है? और सबसे अहम सवाल—साबिर पाक की पाकीज़गी की हिफ़ाज़त आखिर कौन करेगा?
जब तक इस बदसूरत हक़ीक़त पर सख़्त और ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह मुक़द्दस दरगाह सवालों के घेरे में ही खड़ी

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